गुरुवार, 30 नवंबर 2017

क्या पत्थलगड़ी असंवैधानिक है?

झारखंड के आदिवासी इलाकों में हो रही पत्थलगड़ी से सरकार की नींद हराम हो गई है। झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास रांची में बड़ा-बड़ा हार्डिंग लगवाकर एवं अखबारों में विज्ञापन के माध्यम से कड़ा संदेश दे रहे हैं कि पत्थलगड़ी असंवैधानिक है और जो भी इसमें शामिल है उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जायेगी। मैं इन दिनों झारखंड के खूंटी एवं पश्चिमी सिंहभूम जिले के ‘मुंडा’ एवं ‘हो’ आदिवासियों के इलाका में घुम रहा हॅं। यहां प्रत्येक गांव के ससनदिरी में पत्थलगड़ी का अदभुत दृश्य दिखाई पड़ता है, जो मृत्यु के बाद भी आदिवासी समाज का मूल आधार ‘सामुदायिकता’ का एहसास कराता है। आदिवासी अपने पूर्वजों की स्मृति में पत्थलगड़ी करते हैं। बंदगांव के कारिका गांव में मैंने देखा कि एक घर के ठीक दरवाजा के पास एक बड़ा सा पत्थर गाड़ा गया है। गांव के रामसिंह मुंडा बताते हैं कि बाघ के हमले से उक्त परिवार के एक सदस्य की मृत्यु हो गई थी, जिसकी याद में वह पत्थर गाड़ा गया है। इसी तरह कई गांवों में जिन व्यक्तियों की मृत्यु सांप के काटने या जंगली जानवरों के हमले से हुई है उनकी याद में भी घरों के सामने अलग से पत्थर गाड़ा गया हैं। कई गांवों में बड़े-बड़े पत्थर गाड़कर उसपर ग्रामसभा की शक्तियां एवं अधिकारों को लिख दिया गया है। इसी तरह कई गांवों में संवैधानिक अधिकारों को पत्थरों में लिखकर गाड़ा गया है। मैंने यह भी देखा कि आदिवासी लोग औद्योगिक घरानों के लिए सरकार के द्वारा किये जा रहे भूमि अधिग्रहण के खिलाफ संघर्ष कर लड़ाई जीतने की खुशी में भी पत्थलगड़ी किये हुए हैं। 

पत्थलगड़ी का मामला सुर्खियों में तब आया जब खूंटी जिले के कई ग्रामसभाओं ने मिलकर पुलिस एवं प्रशासनिक अधिकारियों को यह कहते हुए बंधक बनाया था कि इन्होंने संविधान के पांचवीं अनुसूची का उल्लंघन कर ग्रामसभा के आदेश के बगैर इन इलाकों में घुसपैठी की है क्योंकि यहां ग्रामसभा सर्वोंपरि है, जिसने बाहरी लोगों के इस इलाके में घुमने पर रोक लगाया है। यहां प्रश्न यह उठता है कि आखिर इन ग्रासभाओं को ऐसे आदेश जारी करना क्यों पड़ा? क्या इसमें सरकार दोषी नहीं है? खूंटी के इलाकों में मुंडा आदिवासी लोग सरकार का क्यों बहिष्कार कर रहे हैं? क्या झारखंड सरकार ने कभी हकीकत जानने की कोशिश की है? झारखंड के पांचवीं अनुसूची क्षेत्र में पड़ने वाले इलाकों में लगातार गैर-आदिवासियों की घुसपैठी होती जा रही है। फलस्वरूप, आदिवासी अपनी जमीन, जंगल, पहांड़, जलस्रोत और खनिज सम्पदा को खोते जा रहे हैं, उनकी जनसंख्या घटती जा रही है और वे अपनी पहचान, भाषा, संस्कृति, परंपरा एवं रूढ़ि से भी बेदखल हो रहे हैं। संविधान के अनुच्छेद 19(5) एवं (6) में यह प्रावधान किया गया है कि सामान्य या आदिवासियों के अस्तित्व में आंच आने पर सरकार इन इलाकों में बाहरी जनसंख्या के अवागमन, जमीन खरीदने, रहने-बसने, नौकरी करने एवं व्यावसाय चलाने पर रोक लगा सकती है। लेकिन केन्द्र एवं राज्य सरकार ने आदिवासियों के हितों की रक्षा के लिए अबतक कोई कदम नहीं उठाया है बल्कि ये सरकारें उनकी जमीन को पॅंजीपतियों को देने के लिए भूमि सुरक्षा कानूनों में संशोधन कर रही हं। सरकारों के इस रवैया के कारण ही आदिवासी लोग ग्रामसभा की शक्तियां एवं अधिकारों का प्रयोग कर अपनी रक्षा करने में जुटे हुए हैं। यदि आदिवासी आज अपने इलाके में गैर-आदिवासियों को घुसने देना नहीं चाहते हैं तो इसका पूर्ण जिम्मेवार केन्द्र एवं राज्य सरकार हैं। 

यहां मौलिक प्रश्न यह है कि क्या पत्थलगड़ी असंवैधानिक हैं? झारखंड सरकार के अनुसार पत्थलगड़ी करना असंवैधानिक है इसलिए पत्थलगड़ी में शामिल सभी लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जायेगी। यदि ऐसा होता है तो खूंटी एवं पश्चिमी सिंहभूम जिले के सभी मुंडा एवं हो आदिवासी लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जायेगी, वे लोग जेल जायेंगे और गांव का गांव खाली हो जायेगा। क्या झारखंड के मुख्यमंत्री को पता भी है कि मुंडा एवं हो आदिवासियों के लिए पत्थलगड़ी का क्या अर्थ है? क्या आदिवासियों की परंपरा और रूढ़ि के बारे में इन्हें जानकारी है? झारखंड सरकार को यह समझना चाहिए कि आदिवासी समाज में पत्थलगड़ी का महत्व खतियान से भी ज्यादा है। जब ब्रिटिश हुकूमत ने इस इलाके के मुंडाओं से कहा कि यह कैसे साबित कर सकते हो कि यह तुम्हारी जमीन है, तब मुंडाओं ने ससनदिरी के पत्थरों को दिखाते हुए जवाब दिया कि यही हमारे अस्तित्व के सबूत हैं। यही हमारा खतियान है। इस जमीन को हमारे पूर्वजों ने जोत-कोड़कर आबाद किया है यह इसका प्रमाण है। ब्रिटिश शासन के समय ससनदिरी के पत्थरों ने ही मुंडाओं को उनकी जमीन पर अधिकार दिलाया था। अंग्रेज आदिवासियों की संस्कृति, रूढ़ि एवं परंपरा का सम्मान करते थे इसलिए उन्होंने पत्थलगड़ी को स्वीकारा। पत्थलगड़ी कई आदिवासी समुदायों की संस्कृति, परंपरा एवं रूढ़ि है। पत्थलगड़ी को पवित्र माना जाता है। आदिवासी लोग अपने पूर्वजों की याद में पत्थलगड़ी करते हैं। यदि हम भारत के संविधान को देखें तो अनुच्छेद - 13(2) में रूढ़ि को विधि का बल माना गया है तथा पांचवी अनुसूची क्षेत्रों के लिए रूढ़ि ही विधि का बल है। आदिवासी समाज रूढ़ि एवं परंपरा से चलता है तथा पत्थलगड़ी आदिवासी समाज की परंपरा हैं इसलिए पत्थलगड़ी पूर्णतः संवैधानिक है। चूंकि झारखंड के 13 जिले पूर्णरूप से अनुसूचित क्षेत्र के अन्तर्गत आते हैं इसलिए झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास को इस इलाके की आदिवासी संस्कृति, परंपरा, रूढ़ि, संवैधानिक एवं कानूनी प्रावधानों की सम्पूर्ण जानकारी होनी चाहिए। क्या मुख्यमंत्री रघुवर दास के द्वारा पत्थलगड़ी को असंवैधानिक कहना संविधान पर हमला नहीं है? क्या यह शर्मनाक नहीं है? क्या यह आदिवासी समुदाय पर सीधा हमला नहीं है? 

हमें यह भी याद रखना चाहिए कि जब 24 दिसंबर 1996 को भारतीय संसद ने पेसा कानून 1996 को पारित कर आदिवासियों की पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था को कानूनी जामा पहना दिया तब देश के अनुसूचित क्षेत्रों में आदिवासियों ने मांदर, नगाड़ा और ढ़ोल बजाकर खुशी मनाया था क्योंकि उन्हें लगा था कि अब उनको अपने गांव में शासन करने का अधिकार मिल गया है। पेसा कानून को बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले पूर्व आई.ए.एस. आफिसर बी.डी. शर्मा के नेतृत्व में स्थापित भारत जन आंदोलन के द्वारा गांव-गांव में पत्थलगड़ी कर उसमें ग्रामसभा की शक्तियां एवं अधिकारों को लिखा गया। इस पत्थलगड़ी का उद्देश्य था गांव-गांव में ग्रामसभा के प्रभुत्व को स्थापित करना, अपना अस्तित्व का एहसास कराना एवं लोगों को उनके अधिकारों के बारे में जानकारी देना। उस समय आदिवासी इलाकों में बड़े पैमाने पर पत्थलगड़ी किया गया। लेकिन तब न केन्द्र सरकार को और न ही राज्य सरकार को इसपर कोई एतराज हुआ था। झारखंड राज्य के गठन के बाद भाजपा, झारखंड मुक्ति मोर्चा, कांग्रेस पार्टी, झारखंड पार्टी, आजसू, जेडीयू एवं आरजेडी जैसी पार्टियां राज्य के सत्ता में हिस्सेदार रहे लेकिन किसी नेता ने पत्थलगड़ी पर कोई सवाल नहीं उठाया था। संभवताः वे जानते थे कि पत्थलगड़ी आदिवासियों की परंपरा है और उसे सत्ता को कोई दिकत नहीं है। लेकिन एक गैर-आदिवासी एवं गैर-झारखंडी रघुवर दास के मुख्यमंत्री बनते ही यहां की साझा संस्कृति, स्थानीयता, सीएनटी/एसपीटी कानून, भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनव्र्यवस्थापन कानून तथा पत्थलगड़ी पर हमला किया गया है। यह निश्चित तौर पर आदिवासियों के लिए चिंताजनक बात है। क्या रघुवर दास को आदिवासियों की संस्कृति, परंपरा एवं रूढ़ि का कोई ख्याल नहीं है?    

यहां मौलिक प्रश्न यह है कि पत्थलगड़ी आज अचानक असंवैधानिक कैसे हो गया? पत्थलगड़ी से मुख्यमंत्री रघुवर दास क्यों घबरा गये है? पत्थलगड़ी ने उन्हें सख्ते में क्यों डाल दिया है? पत्थलगड़ी से क्यों डरती है झारखंड सरकार? असल बात यह है कि झारखंड सरकार ने राज्यभर के 21 लाख एकड़ तथाकथित गैर-मजरूआ जमीन को ‘लैंड बैंक’ बनाकर उसमें डाल दिया है, जिसे औद्योगिक घरानों, निजी उद्यमियों एवं व्यापारियां को देना है। सरकार ने ‘ग्लोबल इंवेस्टर्स सम्मिट’ में 210 एम.ओ.यू. पर हस्ताक्षर कर पूंजीपतियों के साथ 3.10 लाख करोड़ रूपये में झारखंड का सौदा किया है। इसलिए झारखंड की जमीन, जंगल, पहाड़, जलस्रोत और खनिज सम्पदा को पॅंजीपतियों को सौपना है। लेकिन पत्थलगड़ी कर आदिवासी लोग गांव-गांव में घोषणा कर रहे हैं कि उनके इलाकों में कोई भी बाहरी व्यक्ति नहीं घुस सकता है। इसका सीधा अर्थ है भूमि अधिग्रहण में रोड़ा पैदा करना। यदि झारखंड के अनुसूचित क्षेत्रों के सभी गांवों में पत्थलगड़ी किया जाता है तो सरकार को कहीं भी जमीन, जंगल, पहाड़, जलस्रोत और खनिज सम्पदा नहीं मिलेगा। पत्थलगड़ी सरकार के मुंह पर बहुत बड़ा तमाचा है। और इसी डर से सरकार पत्थलगड़ी को असंवैधानिक बताकर पत्थलगड़ी में शामिल लोगों के खिलाफ मुकदमा कर उन्हें गिरफ्तार कर रही है। लेकिन पत्थलगड़ी को असंवैधानिक घोषित करना आदिवासी परंपरा, भारतीय संविधान एवं आदिवासी समुदाय पर हमला है। झारखंड सरकार के द्वारा पत्थलगड़ी के खिलाफ दिये गये विज्ञापन में धरती आबा बिरसा मुंडा के तस्वीर का उपयोग बिरसा मुंडा का अपमान है क्योंकि बिरसा मुंडा उस मुंडा समाज से आते हैं, जहां पत्थलगड़ी एक परंपरा है, जो सदियों से चली आ रही है। पत्थलगड़ी संवैधानिक है, यह आदिवासियों की परंपरा है और ग्रामसभा को पत्थलगड़ी करने का अधिकार भी है। 


संकलन : सुशिल म. कुवर

तसवीर : पत्थलगडी़ (खुंटी, झारखंड)

शनिवार, 9 सितंबर 2017

जोहार" मतलब क्या है ?

[1]. यह शब्द AUSTROASIAN language family का है..तो इसका अर्थ उसी "ऑस्ट्रो एशियन भाषा परिवार" में ढूँढना संभव है.
[2]. Indo Aryan language family की भाषा "संस्कृत,हिन्दी,राजस्थानी,गुजराती" में इस शब्द का अर्थ ढूंढना मूर्खता तो है ही सही....दिशा भटकाने का षड्यंत्र भी है.
[3]. छोटा नागपुर परिक्षैत्र (प.बंगाल, बिहार, झारखंड,छ.ग.,उड़ीसा ) की "संथाली,मुंडारी,कुडुख,हो" आदि भाषाओं के "भाषाई...सांस्कृतिक... भौगोलिक...सामाजिक"...इलाके का गहन अध्ययन करके ही इस शब्द की व्याख्या करनी चाहिए....यदि आप हिन्दी भाषा के आधार पर इसका अर्थ निकाल रहे हो तो स्वयं भी मूर्ख बन रहे हो...दूसरों को भी अपने जैसा मूर्ख बना रहे हो.
[4]. आदिवासी "प्रकृति" को धर्मेश,सिंगबोंगा,मरांग बुरु आदि कई नामों से पूजा करते हैं.....पूजा विधि विधान में उस "प्रकृति की सृजनहार अनंत शक्ति" को....अपनी भावना,विश्वास,श्रद्धा,मान्यता के अनुसार धन्यवाद देने के लिए...जोहार...शब्द का उद्बोधन करता है.
[5]. चूँकि प्रकृति का हिस्सा... वनस्पति हैं,जीव जंतु हैं,पशु पक्षी हैं,जलचर थलचर नभचर हैं,सूर्य चंद्र तारे हैं,जमीन आसमान हैं,नदियाँ पहाड़ सागर हैं,कीड़े मकोडे हैं,रेंगने वाले...दौड़ने वाले...उड़ने वाले सब के सब सजीव हैं,निर्जीव वस्तुएँ भी प्रकृति का अटूट...अनमोल...अभिन्न हिस्सा है...इसलिए तमाम "सजीव...निर्जीव प्रकृति के अंगों की जय हैं....जोहार"....मतलब "सबका कल्याण करने वाली प्रकृति की जय" हैं...जोहार.
[6]. संक्षेप में कहें तो..."धर्म पूर्वी संस्कृति" के पूजा विधि विधान के "पंच परमेश्वर...कुदरत" का आदर सत्कार आदिवासी परंपरा अनुसार करने का हिस्सा है....जोहार.
[7]. मरने के बाद इंसान "पंच तत्व में विलीन" होता है...इसलिए दक्षिणी राजस्थान के "भील" आदिवासी "1 1 रमे,1 2 रमे" के दिन सब सगा संबंधी...गाँव(Village) वाले...पाल(Republic) के संगी साथी....मिलजुल कर...पूर्व दिशा की तरफ मुँह करके...लाइन में लग कर....चावल (Rice) हाथ में लेकर..एक साथ "जोहार" बोलकर मरे हुए मनुष्य को अंतिम विदाई देते हैं...मतलब मन्नारे महिला पुरुष को प्रकृति को सभी मिलकर समर्पित करते हैं...कुदरत से दुआ करते हैं कि इस इंसान को अपने में समाहित कर लें...क्योंकि यह जीव आपका ही अंश था..इस परंपरा के बाद वह इंसान भी ईश्वर तुल्य विश्वास,श्रद्धा,पूजा योग्य हो जाता है...जिससे प्रेरणा ली जा सकें.ध्यान रहे..."भीली बोली भाषा" में "मुंडारी भाषा" के शब्द हैं...जिसमें एक शब्द...जोहार हैं.
[8]. दक्षिणी राजस्थान के भील आदिवासी दिवाली के बाद नया साल मनाते हैं...इस नये साल की मुबारक.. दुआ.. सलाम..उद्बोधन भी कुछ वर्ष पहले "जोहार" ही था...मनुवाद,ब्राह्मणवाद के अथक प्रयास से कुछ वर्ष पहले यह समाप्त हुआ है...मगर बीज स्वरूप आज भी जिंदा है.
[9]. कुछ वर्ष पूर्व जब गाँव के लोग जंगल में पत्तियाँ...घास...पेड़ काटने जाते थे तो "वन देवी"की आराधना में कुछ दारु की बूँदों के छींटे डालकर "जोहार" बोल कर...वन संपदा अपने उपभोग के लिए घर लाते थे...यह परंपरा दुश्मन समुदाय के षड्यंत्र के कारण आज विलुप्त होने के कगार पर है.
[1 0]. कुछ वर्ष पूर्व हमारे लोग नदी नालों में स्नान करने जाते थे...तब... "जोहार....जोहार" बोल कर स्नान करते थे....पानी को शरीर की सफाई में योगदान देने के लिए धन्यवाद देते थे...नदी नाले की आराधना का भी दर्शन था...कोटडा(उदयपुर) इलाके में यह सब जिंदा देखा जा सकता है.
इस तरह "जोहार"का अर्थ हुआ..."सबका कल्याण करने वाली प्रकृति की जय" अर्थात "प्रकृति के प्रति संपूर्ण समर्पण का भाव ही जोहार है"..
यह हिन्दू धर्म,इस्लाम धर्म,ईसाई धर्म,सिक्ख धर्म,बौद्ध धर्म,जैन धर्म,पारसी धर्म की विचारधारा से कई गुना "उच्च क्वालिटी के जीवन दर्शन" की सोच का पर्याय है...
यह बात केवल आदिवासी ही समझ सकता है...कोई गैर आदिवासी D.N.A. नहीं....


जय जोहार,जय आदिवासी,जय भील प्रदेश
भँवरलाल परमार,
सी.सी.सी.सदस्य,
भील ऑटोनोमस कौंसिल

शुक्रवार, 7 जुलाई 2017

आदिवासी माहिती : त्यांची जीवनपद्धती आणि प्रकार



आदिवासी म्हटले की आपल्या डोळ्यासमोर रंगीबेरंगी चित्रविचित्र कपडे घातलेले, डोक्याला पिसे लावलेले, किंवा कवड्या आणि मोठ्या मण्यांचे दागिने घातलेले असे लोक गोल फेर धरून नाचत आहेत असे दृश्य येते. आपण त्यांना असंस्कृत किंवा रानटी समजतो. आपण त्यांच्याबद्दल भलते सलते गैरसमज करून घेतो की ते नरभक्षक असतील किंवा नरबळी देतात. असे काहीही नाही. उलट आदिवासी ह्याचा अर्थच असा आहे की ते आपल्या आधी त्या स्थानावर राहत आहेत. ते मूळचे रहिवासी आहेत. तेथील जमीन,आकाश आणि पाण्यावर यांचा हक्क आहे. आपण त्यांच्या जागेवर अतिक्रमण केले आहे. म्हणजे आपण उपरे आहोत.
आदिवासी म्हणजे दलित नव्हे. दलित आपल्या नागरी संस्कृतीचा एक हिस्सा आहे. आदिवासी भारतीय संविधानाच्या कलम 342 आणि 366 [25] प्रमाणे एक मूळ रहिवासी असून त्यांची वेगळी ओळख आहे. भारताच्या लोकसंख्येचा 8.6 % हिस्सा त्यांचा आहे. [2011 ची जनगणना] आतापर्यंत आपण त्यांना एक कुतुहुलचा विषय म्हणून पाहत होतो. पण बाबा आमटे, प्रकाश आमटे अनुताई वाघ आणि अशा अनेक समाजसेवक लोक आणि नक्षलवादी लोक यामुळे ते एकदम प्रकाशात आले. मग कळले की त्यांची पण एक पूर्ण विकसित अशी संस्कृती, परंपरा आणि इतिहास आहे. पण वेगळेपणा, दुर्गम भाग, अशिक्षितपणा, आणि भाषेची अडचण आणि संकोच ह्यामुळे ते आपणामध्ये मिसळू शकत नाही. त्यातून आणखी वेगळेपण वाढून शेवटी त्याचे परिणाम त्यांच्या बंडखोरपणात होते. तसे पहायला गेले तर भारतात एकूण 679 आदिवासी जमाती आहेत.
आदिवासी मुख्यत्वे करून जंगलात डोंगरात आणि रानात राहतात. त्यामुळे ते शिकारी, खाद्य गोळा करणे आणि थोडी शेती करून गुजराण करतात. भारताच्या मध्य भागातील विंध्य आणि सातपुडा ह्या पर्वत रांगेत जास्तीत जास्त आदिवासी जमाती आहेत. त्यांची वैशिष्ट्यपूर्ण जीवनपद्धती आहे. भाषा आहे. एकूण आदिवासींच्या पैकी 75% ह्या प्रदेशात आहेत. ह्यात झारखंड, मध्यभारत आणि पश्चिम बंगाल येतो. ठळकपणे आंध्रप्रदेश, छत्तीसगढ, गुजराथ, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, ओदिशा, प. बंगाल, आणि ईशान्य भारत आणि लक्षद्वीप व अंदमान निकोबार ही बेटे येथे आदिवासी बहुसंख्य आहेत. उत्तरेकडे जम्मू आणि काश्मीर तसेच दक्षिण भारत येथे पण थोड्या प्रमाणात आहेत. ह्यामध्ये मुख्य जमाती आहेत त्या म्हणजे कुकी, चकमा, गोंड, मुंडा, खासी, नागा, रंपा संथाळ, यादव, खोंड, मरिय, भिल्ल, कोकणा, खुर्दा इत्यादि आहेत. त्याना पूर्वी खूप महत्व असायचे . त्यांच्या वस्तीच्या जवळील खेड्यातील पंचायतीला मुख्य निर्णय घेताना त्यांची परवानगी घ्यावी लागायची. गोंड गर मंडल आणि चंदा हे लोक राज्य करीत होते.
पुरातन काळी त्यांना खूप मान दिला जायचा. महर्षि वाल्मिकी, ज्यांनी रामायण रचले त्यांना राजदरबारी सन्मान होता. एकलव्य हा भिल्ल राजकुमार होता आणि द्रोणाचार्यांचा शिष्य होता. त्याला धर्मराजाच्या राजसूय यज्ञासाठी निमंत्रण होते. निषाद स्त्री शबरी हिने रामाला उष्टी बोरे दिली. त्याने ती आवडीने खाल्ली. ऋषि मातंग यांना पण खूप मान होता.
आदिवासी मध्ये बरेच स्वातंत्र्य सैनिक होते. त्यापैकी तंट्या भिल्ल हा खूप नावाजलेला होता. तमार आणि झालडा हे पण ब्रिटीशांविरुद्ध बंडखोर म्हणून लढले. धरंधर भुयान, भागरू देवी, लक्ष्मण नाईक, जाण्या भिल्ल, रहमा वसावे अशी बरीच नावे घेता येतील ज्यांनी भारताच्या स्वातंत्र्यासाठी मोलाची कामगिरी केली.
आदिवासी खूप वेगळ्या भाषा बोलतात. त्यापैकी महत्त्वाच्या म्हणजे कोरकू, कोकमी, खरीय, गोंडी, गोरमाही, सावरा हलगी संथाली इत्यादि. त्यांचा मुख्य धर्म हिदू आहे आणि थोडे ख्रिश्चन आहेत. हिंदू असले तरी काही आदिवासी मूर्तिपूजक आहेत तर काही एका ईश्वराला मान देणारे आहेत. त्यांना सनामाही म्हणतात. आणि काही शरण प्रथा पाळतात. त्यात संथाली खुरुक आणि मुंडा हे लोक येतात. त्यांच्यात लग्नाच्या विशिष्ट प्रथा आहेत. एका जमातीत लग्ने होत नाहीत. राजा किंवा प्रमुख त्याच्या कर्तबगारीवर ठरतो वंशपरंपरेने नाही.
मधल्या काळात त्यांची स्थिती खूप खालावली गेली. शेत मालक कर भरू न शकल्याने कर्जबाजारी झाले. आणि सावकाराने आणि सरकारने विविध योजना मुळे त्यांना भूमिहीन केले. आणि त्यांनी नक्षलवादी होऊन बंड केले. त्यानंतर सरकारने आदिवासी विकास महामंडळ स्थापन केले. 1972 मध्ये समाज कल्याण विभाग स्थापन केला. त्यानंतर, आदिवासी विकास महामंडळ ह्याची स्थापना झाली. 22 एप्रिल 1984 मध्ये स्वतंत्र विभाग सुरू झाला. महाराष्ट्रात आदिवासी विकास संचालनालय सुरू झाले. त्याच्या अधीन ठाणे, नासिक, अमरावती आणि नागपुर ह्या चार शाखा काढल्या. त्यांच्या मध्ये 85%  दारिद्र्य रेषेखाली आहेत. त्यापैकी 40% शेतकरी आणि 45% शेतमाजुर आहेत.
महाराष्ट्रात उराव, कातकरी, कोलाम, गोंड, ठाकर, परधान, पावरा, माडीया गोंड, हलबा, भिल्ल, कोकणा, महादेव  कोळी अश्या जाती आहेत. विकास महामंडळ त्यांच्या विकासासाठी वेगवेगळ्या योजना करीत आहे. त्या ठाणे, रायगड, नासिक, धुळे, नंदुरबार, जळगाव, अहमदनगर, पुणे, नांदेड, नागपुर, यवतमाळ, भंडारा ,गोंदिया, चंद्रपुर, आणि गडचिरोली इथे विखुरले आहेत. त्यापैकी चंद्रपुर, गोंदिया आणि गडचिरोली इथले आदिवासी नक्षलवाद्यांच्या कारवायांना बळी पडत आहेत. सरकार त्यांना संरक्षण आणि विकास याची मदत करीत आहेत.
सध्या आदिवासींना त्यांच्या हक्काची जाणीव झाली आहे. तसेच त्यांच्या मध्ये शिक्षणाचे प्रमाण वाढले आहे. नोकरीत आरक्षणामुळे त्यांची परिस्थिती सुधारून ते समजाच्या मुख्य प्रवाहात येत आहेत. आठव्या पंच वार्षिक योजनेतून त्यांना शेतीला अनुदान विहिरीसाठी, पशू पालना साठी तसेच इतर जोड धंदे करण्यास अनुदान दिले जात आहे. तसेच त्यांच्या कलाकुसर, भांडी, व इतर कला गुणांना वाव मिळेल असे वातावरण निर्माण केले जात आहे. त्यामुळे आता त्यांच्या मधून खूप नामांकित लोक पुढे येत आहेत. उदा. कविता राऊत. त्यामुळे आपल्या प्रयत्नांना यश मिळून आदिवासींना त्यांचा जुना सुवर्णकाळ जागता येईल अशी अशा करूया.


संकलित : सुशिल म.कुवर