बुधवार, 23 मार्च 2022

गुजरात के डांग जिले का सुप्रसिद्ध हिल स्टेशन डोन

गुजरात का प्रसिद्ध हिल स्टेशन “डोन हिल स्टेशन (Don hill station gujarat)” गुजरात के दूसरे हिल स्टेशन के तौर पर जाना जाता है। अगर आप यहाँ पर जाने का प्लान बना रहे हैं तो जाने से पहले आप इस हिल स्टेशन के बारे में...

वैसे गुजरात में सापुतारा हिल स्टेशन भी बहुत फेमस है और यहाँ पर भी आप प्रकृति के सुन्दर नज़रों का आनंद ले सकते हैं। सापुतारा हिल स्टेशन डोन हिल्स स्टेशन से कुछ ही दूरी पर है।

डोन हिल्स स्टेशन के बारे में..

डोन हिल स्टेशन गुजरात के डांग (Dang) जिले में पठार पर स्थित है। यह समुद्र से 1000 मीटर की ऊंचाई पर है। यह हिल स्टेशन सापूतारा से कुछ ही दूरी पर है तथा गुजरात और महाराष्ट्र की सीमा पर स्थित है और अहवा से 30 किलोमीटर दूर है।

डोन हिल स्टेशन प्रकृति की गोद में बसा हुआ हरियाली से भरपूर हिल स्टेशन है यहाँ आते आते आप शहर के शोर शराबे और भीड़ भाड़ जैसी जिंदगी को भूल जाते हो।

डोन हिल को डोन गाँव के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ के निवासी आदिवासी है जिनकी कुल आबादी तकरीबन 1200 -1500 है। सदियों के मौसम में यहाँ के स्थानीय लोग पर्वतारोहण महोत्सव का आयोजन करते है।

यहाँ पर सुविधाओं का काफी ज्यादा अभाव है इस वजह से आपको यहाँ घूमने के लिए पैदल यात्रा करनी पड़ेगी और अपना खाना और पानी भी खुद लाना होगा।

डोन हिल स्टेशन में सुविधाओं का अभाव है और देखने और करने के लिए कम ही चीजें हैं इसलिए अगर आप यहाँ फैमिली के साथ आने की सोच रहे हैं तो एक बार विचार जरूर कर लें।

डोन हिल्स स्टेशन में करने के लिए कई चीजें है जब आप डोन हिल्स स्टेशन पर घूमने के लिए निकलेंगे तो रास्ते में सुन्दर नज़ारे आपका मन मोह लेंगे।

यहाँ दूर दूर तक हरी भरी पहाड़ियों और रुई जैसे उड़ते बादल आपको एक अलग ही दुनिया में ले जायेंगे। सभी हिल स्टेशन की तरह यहाँ भी आप जगहों पर घूमना और सुन्दर नज़ारे देखने का आनंद ले सकते हैं।

यह जगह ट्रैकिंग के लिए सही है तो अगर आपको लंबी दूरी पैदल चलकर तय करना पसंद है तो यह जगह आपको पसंद आएगी यहाँ पर यात्रा करना ज्यादा मुश्किल नही है। इसके अलावा आप आप यहाँ पर कैम्पिंग कर सकते हैं और कैंप फायर का आनंद ले सकते हैं।

इस हिल स्टेशन में परलान्डिंग जैसी सेवायें भी हैं तो अगर आप आसमान की सैर कर बादलों को नज़दीक से महसूस करना चाहते हो तो आप इस सेवा का लाभ ले सकते हैं लेकिन यह सेवा फ्री नही है इसके लिये आपको पैसे खर्च करने पड़ते हैं।

सापुतारा के तुलना में यहाँ देखने के लिए बहुत ही कम जगह हैं। भले ही यह सापूतारा के बाद दूसरे हिल्स स्टेशन के नाम से मशहूर है लेकिन इसका विकास अभी पूरा तरह नही हुआ है हालाँकि सरकार इसका विकास करने का प्रयत्न कर रही है।


यहाँ पर ईगल का स्टेचू मुख्य व्यू व्यू पॉइंट है। यहाँ से आप सुन्दर नज़ारे देख सकते हो और सेल्फी वगैरह ले सकते हो। डोन हिल में सापुतारा से कम सुविधाएँ होने की वजह से यहाँ आपको भीड़ भी कम देखने को मिलेगी। इसके अलावा अगर आप बजट में हिल स्टेशन का आनंद लेना चाहते हैं डोन हिल बिलकुल सही है।

अगर आप वॉटरफॉल देखने के शौकीन है तो यहाँ पर सबसे पास गिरा वॉटरफॉल है जो की 65 km दूर है हालाँकि यहाँ पर भी आपको छिपे हुए वाटर देखने को मिलेंगे। इन वॉटरफॉल की जानकारी आप वहां के स्थानीय लोगों से ले सकते हो।


जब आप इस हिल की ऊंचाई पर चले जाते हैं तो वहां से छोटे छोटे गाँव देखने में बहुत ही खूबसूरत लगते हैं यहाँ पर बादलों का नज़ारा आपको बहुत ही पसंद आएगा। इसके अलावा आस पास के गाँवों की खेती और उनके जन जीवन का नज़ारा आपको काफी पसंद आयेगा।

डोन हिल, डांग जिले के डोन गाँव में आता है और यहाँ ठहरने के लिए कोई होटल या रिसोर्ट नही हैं अगर आप यहाँ पर बिना किसी प्लानिंग के आये हैं तो एक दिन की ट्रिप के बाद आपको वापिस घर लौटना ही पड़ेगा।

अगर आप फिर भी रुकना चाहते हैं तो रुकने के लिए सापूतारा और अहवा में ही आपको होटल मिलेंगे और अगर आप यहाँ पर कैम्पिंग करने जा रहे हैं तो अपना खाना पीना और बाकी सारी व्यवस्था साथ लेकर आयें।

डोन हिल स्टेशन मानसून (जुलाई से अक्टूबर) के महीने में घूमने का सबसे सही समय हैं। इसके बाद यहाँ का तापमान बढ़ने लगता है और इसी वजह से यहाँ अक्टूबर से जून तक पर्यटकों की संख्या भी कम देखने को मिलेगी।

किसी भी हिल स्टेशन जाने से पहले उसके मौसम की जानकारी जरूर ले लेनी चाहिए। इंटरनेट पर बहुत सी वेबसाइट और एप्प के माध्यम से आप डॉन हिल स्टेशन के मौसम की जानकारी प्राप्त कर सकते हो।

आपको बता दूँ बीते समय के साथ वायु प्रदूषण काफी तेज़ी से बढ़ा है और हिल स्टेशन में भी इसका प्रभाव देखने को मिला है तो किसी भी हिल स्टेशन जाते समय उसकी एयर क्वालिटी को भी जरूर चेक करें।

बात अगर डॉन हिल स्टेशन की करें तो यहाँ का तापमान 32 डिग्री सेल्सियस से 17डिग्री सेल्सियस रहता है। मानसून के मौसम में तापमान में गिरावट देखने को मिलती है इसके बाद तापमान में बढ़ोतरी होती है।

डोन हिल स्टेशन जाते समय आपको सड़कों की हालत की हालत काफी हद तक अच्छी मिलेगी और आपको बाइक या कार से जाते समय ज्यादा परेशानी नही उठानी पड़ती है।

डोन हिल स्टेशन पहुचने की दुरी:

अहवा से 30km, अहमदाबाद से 410.8 km (Via NH 48), सूरत से 168 km (via Gj SH 14), सापुतारा से 51 km (Via Dalwat Link Rd), वलसाड से 141 km, मुल्हेर से 31 km दूर है।

हवाई मार्ग से - यहाँ का सबसे निकटतम एयरपोर्ट सूरत है जो कि 173 किलोमीटर दूर है यहाँ पहुँचने के बाद डोन हिल पहुचने के लिए टैक्सी ले सकते हैं।

रेल्वे से - डोन से सबसे निकटतम रेल्वे स्टेशन सूरत ही है इसके बाद खेरवाड़ी स्टेशन, कस्बे सुकेने स्टेशन और वघई स्टेशन सबसे निकटतम है।

सड़क मार्ग से - सूरत और आस पास के शहरों में निजी कार सेवाएँ उपलब्ध हैं जिनसे आप डोन हिल स्टेशन पहुँच सकते हैं। इसके अलावा आप महाराष्ट्र साल्हेर मुल्हेर से बसों के माध्यम से भी डोन हिल स्टेशन जा सकते हैं।

संकलन : सुशिल म. कुवर

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गुरुवार, 17 मार्च 2022

प्रकृति और संस्कृति ही आदिवासीयों की मूल पहचान...

जोहार साथीयों..

माँ प्रकृति ने हमारी संस्कृति(पहिचान) की रक्षा के लिए हमें निम्नलिखित कुदरती शब्द दिये है जिन्हे मिटाना शरणार्थीयो के बस की बात नही है।

1)आदिवासी(Indigenous)
2)जोहार(Mother nature) 
3)धर्म-पुर्वी(Ante Christ)
4)संस्कृति(जल,जंगल,जमीन)(Culture)  

1) आदिवासी(Indigenous) : 

आदिवासी दो शब्दो से मिलकर बना है 
आदि+वासी
'आदि' का मतलब होता है 'सबसे पहले का' और 'वासी' का मतलब होता है 'वास करने वाला' अब हम इन्हे एक साथ जोडकर इसका मतलब जानते है। 
'सबसे पहले का' + 'वास करने वाला' मतलब इस इस देश में सबसे पहले वास करने वाला आदिवासी है।
अब हम इसे एक परिभाषा के रूप में समझने की कोशिश करेंगे-
आदि अनादी काल से एक ही भौगोलिक स्थान पर अपनी संस्कृति, परंपरा और प्रकृति अनुसार जीवन जीने वाला मानव समुह अर्थात आदिवासी।

2) जोहार(Mother Nature) :

जोहार मतलब सबका कल्याण करने वाली माँ प्रकृति को नमन करना।
इस धरती पर प्रकृति(nature)-(धरती, जल, हवा, सुर्य,आकाश) इसे ही प्रकृति कहते है और इसी प्रकृति से धरती पर अलग अलग जीवो की अलग अलग पेड़-पौधो की उतपत्ती होती है और इसी माँ प्रकृति के कारण जीवन चक्र चलता है इसलिए इस धरती पर निवास करने वाला पहला मानव आदिवासी 'जोहार' शब्द का अभीवादन के रूप में बार बार उपयोग करता है।

3) धर्म-पुर्वी (Ante Christ) :

आदिवासी इस धरती का पहला मानव है जब आदिवासी के रूप में इस धरती पर मानव के रूप में जन्म हुआ था तब इस धरती पर धर्म नही था धर्म नाम की व्यवस्था मानव के व्यक्तित्व विकास  के बाद की व्यवस्था है इसलिए आदिवासी को धर्म पुर्वी कहा जाता है क्योंकि आदिवासी ईसामसी के जन्म से पहले से इस धरती पर वास कर रहा है क्योंकि प्रभु ईसु के माता-पिता भी इजरायल के यरूशलम के बायदा आदिवासी थे। 

4) संस्कृति (Culture) :

आदिवासी सांस्कृतिक होते है उनकी पहिचान आदिवासीयो की पारंपारिक संस्कृति से होती है न की किसी धर्म से और संस्कृति का आधार जल, जंगल, जमीन है मतलब प्रकृति है और आदिवासी जिस स्थान पर रहता है  उस स्थान की भौगोलिक परिस्थिति और उस स्थान की प्रकृति के अनुसार ही जीवन जीता है जैसे
कशमीर लदाख में बर्फ होने से वो मोटे ऊनी कपडे पहनता है इसके लिए उसे कोई बताता नही है और रेगिस्तान में गर्मी के कारण आदिवासी कम कपडे पहनता है और अमेजन जैसे घने जंगल में किसी बाहरी व्यक्ति की आवक जावक नही होती तो वो जंगल को अपना घर समझता है और अपने लोगो को अपना परिवार तो बहुत कम कपडे पहनता है या नही पहनते है।
भोगोलिक स्थान और परिस्थिति के अनुसार ही आदिवासी की बोली,वेश भुषा,वाध यंत्र,औजार,अनाज,खान-पान,गीत गायन और सामाजिक व्यवस्था होती है।

जोहार जिंदाबाद

रविवार, 28 फ़रवरी 2021

आदिवासी गोंड जनजाति के उद्गम स्थल कचारगढ़ की अनसुनी कहानी

कचारगढ़- जहां विराजमान हैं गोंड आदिवासियों के देवता। वैसे, पूर्व महाराष्ट्र के सीमावर्ती प्रांत में स्थित गोंदिया ज़िले का नाम सुनते ही हर किसी की आंखों के सामने नक्सल प्रभावित क्षेत्र की तस्वीर खड़ी हो जाती है। लेकिन, जैव विविधता से भरपूर मिश्रित जंगलों से घिरे इस क्षेत्र में एक प्राकृतिक आश्चर्य भी है – कचारगढ़ की गुफाएं।

यद्यपि, यह नक्सल प्रभावित क्षेत्र में स्थित एक गुफा है, इसलिए यह क्षेत्र गोंड आदिवासियों के देवता की वजह से आकर्षण का एक बड़ा केंद्र बन गया है। फरवरी महीने में, माघी पूर्णिमा के समय यहां वार्षिक तीर्थयात्रा होती है। उस तीर्थयात्रा में हज़ारों की संख्या में श्रद्धालु हिस्सा लेते हैं।

एशिया की सबसे बडी गुफा कचारगढ़ का अंदरूनी भाग

कचारगढ़ एक पवित्र धार्मिक और प्राकृतिक स्थान है, जो सालेकसा तहसील में सालेकसा से 7 किमी की दूरी पर और गोंदिया ज़िला मुख्यालय से 55 किमी दूर पर स्थित है। गोंदिया-दुर्ग रेलवे मार्ग पर स्थित सालेकसा स्टेशन से, दरेकसा-धनेगाव मार्ग होते हुए लोग यहां पहुंचते हैं। दरेकसा मार्ग से कचारगढ़ महज़ सात किलोमीटर की दूरी पर स्थित है ।

यह एक पवित्र धार्मिक स्थान है। अपनी प्राकृतिक सुंदरता की वजह से यह पर्यटकों के आकर्षण का भी बड़ा केंद्र है। इसलिए, यहां पहुंचने वाले आदिवासी भक्तों के साथ अन्य पर्यटक भी बड़ी संख्या में आते हैं। यात्रा के दौरान हर साल लगभग चार लाख भक्त और पर्यटक यहां आते हैं।

इसके अलावा श्रद्धालु और पर्यटक साल भर यहां आते रहते हैं। चूंकि कचारगढ़ गुफा, मध्य प्रांत गोंडवाना के आदिवासियों का प्रमुख श्रद्धा स्थान है, गोंड जनजातियों के लोग यहां दूर-दूर से आते हैं। इस गुफा में अपने पूर्वज तथा आदिवासी गोंड धर्म के संस्थापक पारी कोपार लिंगो और माँ काली कंकाली के दर्शन करने के लिए विभिन्न राज्यों से आदिवासी कोयापूनेम (माघी पूर्णिमा) को कचारगढ़ गुफा में पहुंच जाते हैं ।
कचारगढ़ मेले मे इकट्ठा हुए गोंड जनजाति के लोग

कचारगढ़ पहुंचकर हरी-भरी पर्वत श्रृंखलाएं देखी जा सकती हैं, जो घने जंगलों से घिरी हुई हैं। इन पहाड़ों में एक बड़ी नैसर्गिक गुफा है, जिसे एशिया की सबसे बड़ी प्राकृतिक गुफा माना जाता है। वैसे ये गुफाएं  518 मीटर ऊंचाई पर स्थित हैं। करीब 10 फुट ऊंची, 12 फुट चौड़ी और 20 फुट लंबी प्रारंभिक छोटी गुफा के दाईं ओर की पहाड़ी में बड़ी गुफा स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

आगे चट्टान के शीर्ष पर, लगभग 40 फुट बड़ी गुफा का मुख दिखाई देता है। गुफा का अनुमान बाहर से नहीं लगाया जा सकता। अंदर जाकर ही गुफा के विस्तार का पता चलता है । इसकी संरचना लगभग 25 फुट ऊंची,60 फुट चौड़ी और 100 फुट लंबी है। पहाड़ के एक छेद से प्रकाश की धारा हर वक्त गुफा में बहती रहती है। आसपास के पहाड़ों में भी छोटी गुफाएं हैं,  जहां आदिवासी जनजातियों के प्राचीन देवता – माता जंगो, बाबा जंगो, शंभूसेक और माँ काली कंकाली का वास्तव्य है।

गोंड जनजाति की उत्पत्ति
गोंड जनजातियों के बुज़ुर्गो आमतौर पर यह मानते हैं कि कचारगढ़ में तीन हज़ार साल पहले गोंड जनजाति की उत्पत्ति हुई थी। कहा जाता है कि माता गौरी के 33 पुत्र थे। वह बड़े उपद्रवी थे। इसलिए, एक बार गुस्से में शंभुसेक ने उन्हें कचारगढ़ में एक गुफा में डालकर दरवाज़े पर एक बड़ा पत्थर रख दिया। इस पर माँ काली कंकाली भावुक हो गईं और उसकी आज्ञानुसार किंदरी वादक हिरासुका पाटारी ने अपने संगीत की शक्ति से युवाओं में ऊर्जा पैदा की। तब उन 33 युवकों ने अपनी पूरी शक्ति लगाकर उस पत्थर को ज़ोर का धक्का देकर गिरा दिया और बाहर निकल आए ।

लेकिन, पत्थर के नीचे दबकर संगीतकार पाटारी की मृत्यु हो गई। वे सभी 33 पुत्र उस जगह से चले गए और अन्य प्रदेश में जा बसे। उन्हीं प्रदेशों में उनका वंश आगे बढ़ा। समय के साथ, गोंडी संस्कृति के निर्माता पारी कुपार लिंगो ने उन वंशजों को एक सूत्र में बांधने की कोशिश की। इसमें 33 वंश और 12 पेन मिलकर बने 750 गोत्र । इन गोत्रों  को एक सूत्र में बांधने को गोंडी भाषा में “कच्चा” कहा जाता है । शायद इसलिए, इस स्थान का नाम कचारगढ़ पड़ा होगा।

इस गुफा को ध्यान से देखने पर लोहे और अन्य खनिजों के कच्चे अवशेष दिखाई देते हैं। हो सकता है इसलिए भी इस स्थान को नाम ‘कचारगढ़’ के नाम से जाना जाता हो। कचारगढ़, जो हज़ारों वर्षों से गुमनामी के अभिशाप में घिरा हुआ था, आखिरकार    यह आदिवासी संस्कृति के शोधकर्ताओं और इतिहासकारों की नज़रों में आया। उन्होंने इस स्थान को खोजा और इसका अध्ययन किया और इस नतीजे पर पहुंचे कि यहीं गोंड आदिवासियों का मूलस्थान है।

कचारगढ़ गुफाओं की खोज
ऐसी भी मान्यता है कि गोंड जनजाति का उद्गमस्थल उत्तर दिशा के पहाड़ों में स्थित है, जिसे  ‘काचिकोपा लोहागढ़’ के नाम से जाना जाता था । किंतु यह स्थल कहां है? इसके बारे में  कोई ठोस जानकारी अब तक नहीं है। कुछ लोग इसका स्थान हिमालय, कुछ पचमढ़ी और कुछ दरेकसा के पहाड़ो में बताते थे।

यह स्थान गोंड आदिवासी समूहों की मौखिक कथाओं और परम्पराओं में भी जीवित रहा है। कचारगढ़ गुफाओं के स्थान का विवरण, समय के साथ लुप्त हो गया था। सन 1980 के दशक में, आदिवासी विद्यार्थी संघ के युवा आदिवासी छात्रों ने इसकी खोज शुरू की थी। कहानियों में दिए गए वर्णन के मुताबिक,  उन्होंने गुफा की तलाश में गोंदिया ज़िले के कचारगढ़ की पहाड़ियों को खंगालना शुरू किया गया था।

लेखक मोतीरावन कंगाली सहित एक समूह ने, सालेकसा के पास इस बड़ी गुफा को खोज लिया था, जिसकी छत में एक बड़ा छेद था। गुफा के प्रवेश द्वार के पास एक बड़ा शिलाखंड है। जिसे देख कर लगता है जैसे उसे एक तरफ धकेल दिया गया हो। उसी खोज के बाद से, एक वर्ष की तीर्थयात्रा या कचारगढ़ गढ़ यात्रा आरंभ हो गई। उसी दौरान गोंड लोग अपने मूल पूर्वजों को अत्यधिक सुशोभित पालकी के रूप में लाते हैं – अपने संस्कार स्थल पर जाते हैं और अपने पूर्वजों को श्रद्धांजलि देते हैं।

कचारगढ़ यात्रा का प्रारंभ
आज से 36 साल पहले गोंडी धर्माचार्य स्व. मोतीरावण कंगाली, शोधकर्ता के.बी. मरसकोल्हे , गोंड राजा वासुदेव शहा टेकाम, दादा मरकाम, सुन्हेरसिंह ताराम जैसे लोग कचारगढ़ आए। 1984 में माघ पूर्णिमा के अवसर पर, पांच आदिवासी गोंड लोगों ने धने गांव के प्रांगण में गोंडी धर्म का झंडा फहराकर कचारगढ़ यात्रा की शुरुआत की । आज, कचारगढ़ यात्रा में बहुत बडा जमावड़ा होता है और हर साल लगभग चार से पांच लाख भक्त माघ पूर्णिमा पर इस यात्रा में सम्मिलित होते हैं। कचारगढ़ यात्रा मध्य भारत की सबसे बड़ी भव्य यात्रा है।

गोंड़वाना एक विशाल भौगोलिक क्षेत्र है और गोंड जनजाति छोटे समूहों में गोंड़वाना के पूरे जंगल में फैली हुई है। इसके अलावा वे नाटक या पारंपरिक नृत्य करते हैं । जिससे उनके स्थान और समूह की संस्कृति की छवि सामने आता है। जब इतनी बड़ी संख्या में लोग, इतनी महत्वपूर्ण जगह पर जमा होते हैं तो इस अवसर पर, यहां कई बड़े निर्णय भी लिये जाते हैं।

उदाहरण के लिए, पिछले कुछ वर्षों में, जनजाति ने उद्योग के लिए जंगल से बांस को नहीं काटने देने का फैसला किया था, जो महत्वपूर्ण कदमों में से एक था। सभी देवताओं के अलावा, वे जंगल से भी अपनी सुरक्षा एवं कल्याण के लिए प्रार्थना करते हैं।

कचारगढ़ मेले में गोंड जनजातियों का पारंपरिक नृत्य

कचारगढ़ मेले में गोंड जनजातियों का पारंपरिक नृत्य होता है। आदिवासियों का यह मानना है कि गोंडी संस्कृति के रचनाकार शंभु, गौरा, पहाड़ी कुपार लिंगो, संगीत सम्राट हिरसुका पाटालीर, 33 कोट सगापेन और 12 पेन एवं 750 कुल, सल्ला गांगरा शक्ति यहां स्थित हैं। यह गोंडी धर्म की आस्था और विश्वास है कि उनकी  आत्माएं  यहां के घने जंगलों की गुफाओं में निवास करती हैं।

संकलन : सुशिल म. कुवर

तसवीर : कच्छारगढ़ (सालेकसा, गोंदिया)


गुरुवार, 4 अक्टूबर 2018

असुर राजाओं ने महिलाओं पर कभी हाथ नहीं उठाया ।


असुर राजा कभी महिलाओं पर हाथ नहीं उठाते थे। जिनको राक्षस बोला गया वास्तव में वो राक्षस नहीं थे , वो भारत के मुलवासी शासक, मुलवासी राजा थे,इतिहासकार विजय महेश कहते हैं कि ‘माही’ शब्द का अर्थ एक ऐसा व्यक्ति होता है, जो दुनिया में ‘शांति कायम करे। अधिकांश देशो के राजाओं की तरह महिषासुर न केवल विद्वान और शक्तिशाली राजा थे, बल्कि उनके पास 177 बुद्धिमान सलाहकार थे। उनका राज्य प्राकृतिक संसाधनों से भरभूर था। उनके राज्य में होम या यज्ञ जैसे विध्वंसक धार्मिक अनुष्ठानों के लिए कोई जगह नहीं थी।

आखिर क्या कारण था कि सुरों (देवताओं) ने हमेशा अपनी महिलाओं को असुरों राजाओं की हत्या करने के लिए भेजा। इसके कारणों की व्याख्या करते हुए विजय बताते हैं कि “देवता यह अच्छी तरह जानते थे कि असुर राजा कभी भी महिलाओं के खिलाफ अपने हथियार नहीं उठायेंगे। इनमें से अधिकांश महिलाओं ने असुर राजाओं की हत्या कपटपूर्ण तरीके से की है। अपने शर्म को छिपाने के लिए भगवानों की इन हत्यारी बीवियों के दस हाथों, अदभुत हथियारों इत्यादि की कहानी गढ़ी गई।

महीषासुर एक जननायक पुस्तक में संकलित एक महत्वपूर्ण लेख में झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री व दिशोम गुरु शिबू सोरेन कहते हैं, "जब बचपन में मैं रावण वद्ध और महिषासुर मर्दिनी दुर्गा के बारे में सुनता था तब अजीब लगता था। अजीब लगने की वजह यह थी कि महिषासुर और उसकी वेशभूषा बिल्कुल हमलोगों के जैसी थी। वह हमारी तरह ही जंगलों में रहता था, गायें चराता था, शिकार करता था। फिर एक सवाल जो मुझे परेशान करता था, वह यह कि आखिर देवताओं को हम असुरों के साथ युद्ध क्यों लड़ना पड़ा होगा। फिर जब बड़ा हुआ तो सारी बारें समझ आयी कि यह सब अभिजात्य वर्ग की साजिश थी, बहरहाल आज की युवा पीढ़ी स्वर्णों द्वारा फैलाये गए अंधविश्वास की सच्चाई को समझे और नये समाज के निर्माण में योगदान दें। 


संकलित: सु.म.कुवर

सोमवार, 1 जनवरी 2018

आदिवासींची दखल घेणार कधी ??


आदिवासी म्हटले की, जगाच्या समोर डोंगर दर्‍यात राहणारा, जंगलात राहणारा, उघडा, नागडा असणारा, ओबड धोबड चेहर्‍याचा, जगाशी कुठलाही संपर्क नसणारा समाज होय. आदिवासी या नावाला फार प्राचीन इतिहास आहे, हे सांगायला नको. आदिवासी या शब्दातच आदि म्हणजेच अगोदरचा पूर्वीचा वासी, म्हणजे निवास करणारा. मग या जगाच्या पाठीवर ज्या माणसाने, ज्या जिवाने पहिल्यांदा जन्म घेतला तो जीव म्हणजे आदिमानव म्हणजेच आदिवासी. परंतु तोच आदिवासी जगाच्या पाठीवरून दूर फेकला गेला आहे. आदिवासींचे अस्तित्व नाकारण्यात आले आहे. आज जगाच्या पाठीवर ज्या काही कला अस्तित्वात आहेत. त्या सगळ्या कलांचा उद्गाता आदिवासी आहे. आदिवासींची लोककला, चित्रकला, नृत्य, वादन, गायन, शिल्पकला याला तोड नाही. परंतु ही कला आदिवासी समाजापूर्ती र्मयादित राहिली. पुढारलेल्या समाजाने ही कला अवगत करून, त्या कलेचा विकास केला आहे.

पण आदिवासींच्या कलेची, त्यांच्या जीवनाची खर्‍या अर्थाने इतिहासकारांनी दखलच घेतली नाही. नव्हे घेण्याची आवश्यकता वाटली नसावी. म्हणून आदिवासी आजही आपली उपजीविका जंगलात मिळणार्‍या रानमेवाव्यावर करीत आहे. आजही गडचिरोली, चंद्रपूर, अमरावती, ठाणे, किनवट, आदिलाबाद (आंप्र.) या भागात राहणारे आदिवासी बांधव जंगलाच्या जवळच राहणे पसंत करतात. ‘आदिवासी तेथे जंगल, जंगल तेथे आदिवासी’ असल्यामुळे निसर्गातील प्रत्येक वस्तूला ते दैवत मानतात. निसर्गावर त्यांची निस्सीम श्रद्धा आहे. आखाडी सण साजरा करण्यापूर्वी आदिवासी बांधव जंगलाची मनोभावे पूजा करतात. तेव्हाच झाडाला हात लावतात. सागाच्या झाडाचेही या वेळी पूजन केले जाते. कारण आदिवासी आपले घर पावसाळ्यात गळू नये, पावसाचे पाणी घरात पडू नये म्हणून सागाच्या झाडांची पाने घरावर अच्छादतात.


संयुक्त राष्ट्रसंघटना आणि तिची सलग्न संस्था आंतरराष्ट्रीय मजूर संघटनेने आदिवासींना ‘इंडिजिनस’ अर्थात देशज, मूळनिवासी असे संबोधावे अशी शिफारस केली आहे. आज आदिवासी या शब्दाची मानक, परिपूर्ण आणि नि:संदिग्ध व्याख्या नसली तरी आदिवासींसाठी विश्‍वस्तरावर ‘इंडिजिनस’ किंवा ‘अँबॉरिजनिझ’हेच शब्द प्रचलित दिसतात. संयुक्त राष्ट्रसंघटनाने जागतिक आदिवासी समुदायाच्या अधिकाराच्या रक्षणार्थ १९९३ हे जागतिक आदिवासी वर्ष घोषित केले होते. तसेच, ९ ऑगस्ट हा ‘जागतिक आदिवासी दिवस’ म्हणून साजरा करण्याचा निर्णय घेतला आहे. १३ सप्टेंबर २00७ रोजी आदिवासींचा जाहीरनामा युनोच्या आमसभेत मांडण्यात आला. परंतु भारतात जागतिक आदिवासी दिवस साजरा करण्याच्या बाबतीत उदासिनता दिसून आली. कारण भारत सरकारने युनोला दिलेल्या निवेदनात म्हटले आहे की, संयुक्त राष्ट्र संघटनने आदिवासींची जी व्याख्या केली आहे, त्यात भारतीय समाविष्ट होत नाहीत. भारतीय आदिवासी किंवा अनुसूचित नाहीत तर देशज आहेत आणि त्यांच्यात कुठल्याही प्रकारचा सामाजिक किंवा आर्थिक पक्षपात होत नाही. या संदर्भात आदिवासी प्रतिनिधींनी विविध ठिकाणी कार्यक्रम, कार्यशाळा घेऊन युनोच्या ‘इंडिजीनस’ शब्दाच्या परिभाषेवर चर्चा घडवून आणली. २५ ते २९ जुलै च्या दरम्यान जिनेव्हा येथे संयुक्त राष्ट्राच्या आदिवासी कार्यगटाची बैठक आहे, तेथे एका शिष्टमंडळाला पाठविण्याचाही या कार्यशाळेत निर्णय झाला. आदिवासी हेच पृथ्वीचे मूळनिवासी आहेत आणि ४६१ आदिवासी जमाती भारतात वास्तव्यास आहेत, हे नाकारता येणे शक्य नाही. आदिवासींच्या जातीत आज आणखी काही जाती समाविष्ट होण्याच्या मार्गावर आहेत.

आदिवासी समाजाने निसर्गाच्या विरुद्ध कधी पाऊल टाकले नाही. निसर्गाच्या नियमाप्रमाणे आदिवासी आपले जीवन जगत असतो. म्हणून इतरांनीही निसर्गाला समजून घेणे आवश्यक आहे. आदिवासींची संस्कृती, आचारविचार समजून घेण्याऐवजी आदिवासींची होळी करून, पोळी खाणारे जास्त आहेत. आजही आदिवासींना कोण मित्र नि कोण शत्रू हे कळत नाही. आधुनिकतेचा बुरखा घातलेल्यांना जंगलाचे महत्त्व काय समजणार? आदिवासींनी खर्‍या अथाने जंगलाचे रक्षण केले. समतोल राखण्याचे काम केले. म्हणून आदिवसी हेच जंगलचे राजे आहेत. जंगलाशी आदिवासी समाजाचे अतूट नाते आहेत.

भारतामध्ये प्रामुख्याने चेंचू इरुला, कदार, कोटा या निग्रो, प्रोटो ऑस्ट्रॉलॉईड या वांशिक जमाती केरळ, तमिळनाडू, कर्नाटक आणि आंध्रप्रदेशात राहतात. मध्य भारतात बिहार, ओरिसा, मध्य प्रदेश,पं. बंगाल या राज्यामध्ये गोंड, संथाल, भूमजी, हो, ओरियन, मुंडा, कोरवा या प्रमुख जाती वास्तव्य करतात. राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, दमण-दीव, दादरा, नगर हवेली या राज्यांत आणि केंद्रशासित प्रदेशात भिल्ल या प्रमुख जमातीचे लोक राहतात. या व्यतिरिक्त कोळी, कोकणा-कोकणी, वारली, ठाकूर, कातकरी, आंध्र परधान, कोलाम, कोरकू, माडिया, गोंड, राज-गोंड या जमाती राहतात.

आदिवासी हे हिंदू नाहीत, असा निर्णय न्यायालयाने एका प्रकरणात १९ जानेवारी १९७९ रोजी दिला आहे. न्यायाधीश महोदयांनी आपल्या निकालात म्हटले आहे की, गोंड हे हिंदू नाहीत. कारण त्यांची भाषा, संस्कृती, गीत, संगीत, नृत्य, परंपरा वेगळी आहे. त्यांची भाषा गोंडी आहे. धर्म गोंडी आहे. हिंदू धर्मातील चार वर्णांशी गोंडसमाजाचा काहीही संबंध नाही. त्यामुळे गोंडाना हिंदू म्हणणे योग्य नाही. आदिवासींमध्येही अनेक स्वातंत्र्यसैनिक होते, पण त्यांची कुणालाही आठवण नाही. क्रांतिकारक बाबूराव शेडमाके, नारायणसिंह उईके, राघोजी भांगरे, बख्त बुलंद शहा, दलपतशहा, रघुनाथ शहा, विरांगणा राणी दुर्गावती मडावी, कुमरा भीमा, यापैकी एकही क्रांतिकारकांची महाराष्ट्र शासनाने, पाठय़पुस्तक मंडळाने दखल घेतली नाही. यासाठी आदिवासी साहित्यिकांनी, सामाजिक कार्यकर्त्यांनी, पुढार्‍यांनी पुढाकार घेतलेला दिसत नाही. म्हणून ९ ऑगस्ट या आदिवासी दिवसाचे औचित्य साधून सार्वजनिक सुट्टी जाहीर करावी व आदिवासी बांधवांनी हा दिवस मोठय़ा उत्साहाने साजरा करावा.


संकलित : सुशिल म कुवर  

गुरुवार, 30 नवंबर 2017

क्या पत्थलगड़ी असंवैधानिक है?

झारखंड के आदिवासी इलाकों में हो रही पत्थलगड़ी से सरकार की नींद हराम हो गई है। झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास रांची में बड़ा-बड़ा हार्डिंग लगवाकर एवं अखबारों में विज्ञापन के माध्यम से कड़ा संदेश दे रहे हैं कि पत्थलगड़ी असंवैधानिक है और जो भी इसमें शामिल है उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जायेगी। मैं इन दिनों झारखंड के खूंटी एवं पश्चिमी सिंहभूम जिले के ‘मुंडा’ एवं ‘हो’ आदिवासियों के इलाका में घुम रहा हॅं। यहां प्रत्येक गांव के ससनदिरी में पत्थलगड़ी का अदभुत दृश्य दिखाई पड़ता है, जो मृत्यु के बाद भी आदिवासी समाज का मूल आधार ‘सामुदायिकता’ का एहसास कराता है। आदिवासी अपने पूर्वजों की स्मृति में पत्थलगड़ी करते हैं। बंदगांव के कारिका गांव में मैंने देखा कि एक घर के ठीक दरवाजा के पास एक बड़ा सा पत्थर गाड़ा गया है। गांव के रामसिंह मुंडा बताते हैं कि बाघ के हमले से उक्त परिवार के एक सदस्य की मृत्यु हो गई थी, जिसकी याद में वह पत्थर गाड़ा गया है। इसी तरह कई गांवों में जिन व्यक्तियों की मृत्यु सांप के काटने या जंगली जानवरों के हमले से हुई है उनकी याद में भी घरों के सामने अलग से पत्थर गाड़ा गया हैं। कई गांवों में बड़े-बड़े पत्थर गाड़कर उसपर ग्रामसभा की शक्तियां एवं अधिकारों को लिख दिया गया है। इसी तरह कई गांवों में संवैधानिक अधिकारों को पत्थरों में लिखकर गाड़ा गया है। मैंने यह भी देखा कि आदिवासी लोग औद्योगिक घरानों के लिए सरकार के द्वारा किये जा रहे भूमि अधिग्रहण के खिलाफ संघर्ष कर लड़ाई जीतने की खुशी में भी पत्थलगड़ी किये हुए हैं। 

पत्थलगड़ी का मामला सुर्खियों में तब आया जब खूंटी जिले के कई ग्रामसभाओं ने मिलकर पुलिस एवं प्रशासनिक अधिकारियों को यह कहते हुए बंधक बनाया था कि इन्होंने संविधान के पांचवीं अनुसूची का उल्लंघन कर ग्रामसभा के आदेश के बगैर इन इलाकों में घुसपैठी की है क्योंकि यहां ग्रामसभा सर्वोंपरि है, जिसने बाहरी लोगों के इस इलाके में घुमने पर रोक लगाया है। यहां प्रश्न यह उठता है कि आखिर इन ग्रासभाओं को ऐसे आदेश जारी करना क्यों पड़ा? क्या इसमें सरकार दोषी नहीं है? खूंटी के इलाकों में मुंडा आदिवासी लोग सरकार का क्यों बहिष्कार कर रहे हैं? क्या झारखंड सरकार ने कभी हकीकत जानने की कोशिश की है? झारखंड के पांचवीं अनुसूची क्षेत्र में पड़ने वाले इलाकों में लगातार गैर-आदिवासियों की घुसपैठी होती जा रही है। फलस्वरूप, आदिवासी अपनी जमीन, जंगल, पहांड़, जलस्रोत और खनिज सम्पदा को खोते जा रहे हैं, उनकी जनसंख्या घटती जा रही है और वे अपनी पहचान, भाषा, संस्कृति, परंपरा एवं रूढ़ि से भी बेदखल हो रहे हैं। संविधान के अनुच्छेद 19(5) एवं (6) में यह प्रावधान किया गया है कि सामान्य या आदिवासियों के अस्तित्व में आंच आने पर सरकार इन इलाकों में बाहरी जनसंख्या के अवागमन, जमीन खरीदने, रहने-बसने, नौकरी करने एवं व्यावसाय चलाने पर रोक लगा सकती है। लेकिन केन्द्र एवं राज्य सरकार ने आदिवासियों के हितों की रक्षा के लिए अबतक कोई कदम नहीं उठाया है बल्कि ये सरकारें उनकी जमीन को पॅंजीपतियों को देने के लिए भूमि सुरक्षा कानूनों में संशोधन कर रही हं। सरकारों के इस रवैया के कारण ही आदिवासी लोग ग्रामसभा की शक्तियां एवं अधिकारों का प्रयोग कर अपनी रक्षा करने में जुटे हुए हैं। यदि आदिवासी आज अपने इलाके में गैर-आदिवासियों को घुसने देना नहीं चाहते हैं तो इसका पूर्ण जिम्मेवार केन्द्र एवं राज्य सरकार हैं। 

यहां मौलिक प्रश्न यह है कि क्या पत्थलगड़ी असंवैधानिक हैं? झारखंड सरकार के अनुसार पत्थलगड़ी करना असंवैधानिक है इसलिए पत्थलगड़ी में शामिल सभी लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जायेगी। यदि ऐसा होता है तो खूंटी एवं पश्चिमी सिंहभूम जिले के सभी मुंडा एवं हो आदिवासी लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जायेगी, वे लोग जेल जायेंगे और गांव का गांव खाली हो जायेगा। क्या झारखंड के मुख्यमंत्री को पता भी है कि मुंडा एवं हो आदिवासियों के लिए पत्थलगड़ी का क्या अर्थ है? क्या आदिवासियों की परंपरा और रूढ़ि के बारे में इन्हें जानकारी है? झारखंड सरकार को यह समझना चाहिए कि आदिवासी समाज में पत्थलगड़ी का महत्व खतियान से भी ज्यादा है। जब ब्रिटिश हुकूमत ने इस इलाके के मुंडाओं से कहा कि यह कैसे साबित कर सकते हो कि यह तुम्हारी जमीन है, तब मुंडाओं ने ससनदिरी के पत्थरों को दिखाते हुए जवाब दिया कि यही हमारे अस्तित्व के सबूत हैं। यही हमारा खतियान है। इस जमीन को हमारे पूर्वजों ने जोत-कोड़कर आबाद किया है यह इसका प्रमाण है। ब्रिटिश शासन के समय ससनदिरी के पत्थरों ने ही मुंडाओं को उनकी जमीन पर अधिकार दिलाया था। अंग्रेज आदिवासियों की संस्कृति, रूढ़ि एवं परंपरा का सम्मान करते थे इसलिए उन्होंने पत्थलगड़ी को स्वीकारा। पत्थलगड़ी कई आदिवासी समुदायों की संस्कृति, परंपरा एवं रूढ़ि है। पत्थलगड़ी को पवित्र माना जाता है। आदिवासी लोग अपने पूर्वजों की याद में पत्थलगड़ी करते हैं। यदि हम भारत के संविधान को देखें तो अनुच्छेद - 13(2) में रूढ़ि को विधि का बल माना गया है तथा पांचवी अनुसूची क्षेत्रों के लिए रूढ़ि ही विधि का बल है। आदिवासी समाज रूढ़ि एवं परंपरा से चलता है तथा पत्थलगड़ी आदिवासी समाज की परंपरा हैं इसलिए पत्थलगड़ी पूर्णतः संवैधानिक है। चूंकि झारखंड के 13 जिले पूर्णरूप से अनुसूचित क्षेत्र के अन्तर्गत आते हैं इसलिए झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास को इस इलाके की आदिवासी संस्कृति, परंपरा, रूढ़ि, संवैधानिक एवं कानूनी प्रावधानों की सम्पूर्ण जानकारी होनी चाहिए। क्या मुख्यमंत्री रघुवर दास के द्वारा पत्थलगड़ी को असंवैधानिक कहना संविधान पर हमला नहीं है? क्या यह शर्मनाक नहीं है? क्या यह आदिवासी समुदाय पर सीधा हमला नहीं है? 

हमें यह भी याद रखना चाहिए कि जब 24 दिसंबर 1996 को भारतीय संसद ने पेसा कानून 1996 को पारित कर आदिवासियों की पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था को कानूनी जामा पहना दिया तब देश के अनुसूचित क्षेत्रों में आदिवासियों ने मांदर, नगाड़ा और ढ़ोल बजाकर खुशी मनाया था क्योंकि उन्हें लगा था कि अब उनको अपने गांव में शासन करने का अधिकार मिल गया है। पेसा कानून को बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले पूर्व आई.ए.एस. आफिसर बी.डी. शर्मा के नेतृत्व में स्थापित भारत जन आंदोलन के द्वारा गांव-गांव में पत्थलगड़ी कर उसमें ग्रामसभा की शक्तियां एवं अधिकारों को लिखा गया। इस पत्थलगड़ी का उद्देश्य था गांव-गांव में ग्रामसभा के प्रभुत्व को स्थापित करना, अपना अस्तित्व का एहसास कराना एवं लोगों को उनके अधिकारों के बारे में जानकारी देना। उस समय आदिवासी इलाकों में बड़े पैमाने पर पत्थलगड़ी किया गया। लेकिन तब न केन्द्र सरकार को और न ही राज्य सरकार को इसपर कोई एतराज हुआ था। झारखंड राज्य के गठन के बाद भाजपा, झारखंड मुक्ति मोर्चा, कांग्रेस पार्टी, झारखंड पार्टी, आजसू, जेडीयू एवं आरजेडी जैसी पार्टियां राज्य के सत्ता में हिस्सेदार रहे लेकिन किसी नेता ने पत्थलगड़ी पर कोई सवाल नहीं उठाया था। संभवताः वे जानते थे कि पत्थलगड़ी आदिवासियों की परंपरा है और उसे सत्ता को कोई दिकत नहीं है। लेकिन एक गैर-आदिवासी एवं गैर-झारखंडी रघुवर दास के मुख्यमंत्री बनते ही यहां की साझा संस्कृति, स्थानीयता, सीएनटी/एसपीटी कानून, भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनव्र्यवस्थापन कानून तथा पत्थलगड़ी पर हमला किया गया है। यह निश्चित तौर पर आदिवासियों के लिए चिंताजनक बात है। क्या रघुवर दास को आदिवासियों की संस्कृति, परंपरा एवं रूढ़ि का कोई ख्याल नहीं है?    

यहां मौलिक प्रश्न यह है कि पत्थलगड़ी आज अचानक असंवैधानिक कैसे हो गया? पत्थलगड़ी से मुख्यमंत्री रघुवर दास क्यों घबरा गये है? पत्थलगड़ी ने उन्हें सख्ते में क्यों डाल दिया है? पत्थलगड़ी से क्यों डरती है झारखंड सरकार? असल बात यह है कि झारखंड सरकार ने राज्यभर के 21 लाख एकड़ तथाकथित गैर-मजरूआ जमीन को ‘लैंड बैंक’ बनाकर उसमें डाल दिया है, जिसे औद्योगिक घरानों, निजी उद्यमियों एवं व्यापारियां को देना है। सरकार ने ‘ग्लोबल इंवेस्टर्स सम्मिट’ में 210 एम.ओ.यू. पर हस्ताक्षर कर पूंजीपतियों के साथ 3.10 लाख करोड़ रूपये में झारखंड का सौदा किया है। इसलिए झारखंड की जमीन, जंगल, पहाड़, जलस्रोत और खनिज सम्पदा को पॅंजीपतियों को सौपना है। लेकिन पत्थलगड़ी कर आदिवासी लोग गांव-गांव में घोषणा कर रहे हैं कि उनके इलाकों में कोई भी बाहरी व्यक्ति नहीं घुस सकता है। इसका सीधा अर्थ है भूमि अधिग्रहण में रोड़ा पैदा करना। यदि झारखंड के अनुसूचित क्षेत्रों के सभी गांवों में पत्थलगड़ी किया जाता है तो सरकार को कहीं भी जमीन, जंगल, पहाड़, जलस्रोत और खनिज सम्पदा नहीं मिलेगा। पत्थलगड़ी सरकार के मुंह पर बहुत बड़ा तमाचा है। और इसी डर से सरकार पत्थलगड़ी को असंवैधानिक बताकर पत्थलगड़ी में शामिल लोगों के खिलाफ मुकदमा कर उन्हें गिरफ्तार कर रही है। लेकिन पत्थलगड़ी को असंवैधानिक घोषित करना आदिवासी परंपरा, भारतीय संविधान एवं आदिवासी समुदाय पर हमला है। झारखंड सरकार के द्वारा पत्थलगड़ी के खिलाफ दिये गये विज्ञापन में धरती आबा बिरसा मुंडा के तस्वीर का उपयोग बिरसा मुंडा का अपमान है क्योंकि बिरसा मुंडा उस मुंडा समाज से आते हैं, जहां पत्थलगड़ी एक परंपरा है, जो सदियों से चली आ रही है। पत्थलगड़ी संवैधानिक है, यह आदिवासियों की परंपरा है और ग्रामसभा को पत्थलगड़ी करने का अधिकार भी है। 


संकलन : सुशिल म. कुवर

तसवीर : पत्थलगडी़ (खुंटी, झारखंड)

शनिवार, 9 सितंबर 2017

जोहार" मतलब क्या है ?

[1]. यह शब्द AUSTROASIAN language family का है..तो इसका अर्थ उसी "ऑस्ट्रो एशियन भाषा परिवार" में ढूँढना संभव है.
[2]. Indo Aryan language family की भाषा "संस्कृत,हिन्दी,राजस्थानी,गुजराती" में इस शब्द का अर्थ ढूंढना मूर्खता तो है ही सही....दिशा भटकाने का षड्यंत्र भी है.
[3]. छोटा नागपुर परिक्षैत्र (प.बंगाल, बिहार, झारखंड,छ.ग.,उड़ीसा ) की "संथाली,मुंडारी,कुडुख,हो" आदि भाषाओं के "भाषाई...सांस्कृतिक... भौगोलिक...सामाजिक"...इलाके का गहन अध्ययन करके ही इस शब्द की व्याख्या करनी चाहिए....यदि आप हिन्दी भाषा के आधार पर इसका अर्थ निकाल रहे हो तो स्वयं भी मूर्ख बन रहे हो...दूसरों को भी अपने जैसा मूर्ख बना रहे हो.
[4]. आदिवासी "प्रकृति" को धर्मेश,सिंगबोंगा,मरांग बुरु आदि कई नामों से पूजा करते हैं.....पूजा विधि विधान में उस "प्रकृति की सृजनहार अनंत शक्ति" को....अपनी भावना,विश्वास,श्रद्धा,मान्यता के अनुसार धन्यवाद देने के लिए...जोहार...शब्द का उद्बोधन करता है.
[5]. चूँकि प्रकृति का हिस्सा... वनस्पति हैं,जीव जंतु हैं,पशु पक्षी हैं,जलचर थलचर नभचर हैं,सूर्य चंद्र तारे हैं,जमीन आसमान हैं,नदियाँ पहाड़ सागर हैं,कीड़े मकोडे हैं,रेंगने वाले...दौड़ने वाले...उड़ने वाले सब के सब सजीव हैं,निर्जीव वस्तुएँ भी प्रकृति का अटूट...अनमोल...अभिन्न हिस्सा है...इसलिए तमाम "सजीव...निर्जीव प्रकृति के अंगों की जय हैं....जोहार"....मतलब "सबका कल्याण करने वाली प्रकृति की जय" हैं...जोहार.
[6]. संक्षेप में कहें तो..."धर्म पूर्वी संस्कृति" के पूजा विधि विधान के "पंच परमेश्वर...कुदरत" का आदर सत्कार आदिवासी परंपरा अनुसार करने का हिस्सा है....जोहार.
[7]. मरने के बाद इंसान "पंच तत्व में विलीन" होता है...इसलिए दक्षिणी राजस्थान के "भील" आदिवासी "1 1 रमे,1 2 रमे" के दिन सब सगा संबंधी...गाँव(Village) वाले...पाल(Republic) के संगी साथी....मिलजुल कर...पूर्व दिशा की तरफ मुँह करके...लाइन में लग कर....चावल (Rice) हाथ में लेकर..एक साथ "जोहार" बोलकर मरे हुए मनुष्य को अंतिम विदाई देते हैं...मतलब मन्नारे महिला पुरुष को प्रकृति को सभी मिलकर समर्पित करते हैं...कुदरत से दुआ करते हैं कि इस इंसान को अपने में समाहित कर लें...क्योंकि यह जीव आपका ही अंश था..इस परंपरा के बाद वह इंसान भी ईश्वर तुल्य विश्वास,श्रद्धा,पूजा योग्य हो जाता है...जिससे प्रेरणा ली जा सकें.ध्यान रहे..."भीली बोली भाषा" में "मुंडारी भाषा" के शब्द हैं...जिसमें एक शब्द...जोहार हैं.
[8]. दक्षिणी राजस्थान के भील आदिवासी दिवाली के बाद नया साल मनाते हैं...इस नये साल की मुबारक.. दुआ.. सलाम..उद्बोधन भी कुछ वर्ष पहले "जोहार" ही था...मनुवाद,ब्राह्मणवाद के अथक प्रयास से कुछ वर्ष पहले यह समाप्त हुआ है...मगर बीज स्वरूप आज भी जिंदा है.
[9]. कुछ वर्ष पूर्व जब गाँव के लोग जंगल में पत्तियाँ...घास...पेड़ काटने जाते थे तो "वन देवी"की आराधना में कुछ दारु की बूँदों के छींटे डालकर "जोहार" बोल कर...वन संपदा अपने उपभोग के लिए घर लाते थे...यह परंपरा दुश्मन समुदाय के षड्यंत्र के कारण आज विलुप्त होने के कगार पर है.
[1 0]. कुछ वर्ष पूर्व हमारे लोग नदी नालों में स्नान करने जाते थे...तब... "जोहार....जोहार" बोल कर स्नान करते थे....पानी को शरीर की सफाई में योगदान देने के लिए धन्यवाद देते थे...नदी नाले की आराधना का भी दर्शन था...कोटडा(उदयपुर) इलाके में यह सब जिंदा देखा जा सकता है.
इस तरह "जोहार"का अर्थ हुआ..."सबका कल्याण करने वाली प्रकृति की जय" अर्थात "प्रकृति के प्रति संपूर्ण समर्पण का भाव ही जोहार है"..
यह हिन्दू धर्म,इस्लाम धर्म,ईसाई धर्म,सिक्ख धर्म,बौद्ध धर्म,जैन धर्म,पारसी धर्म की विचारधारा से कई गुना "उच्च क्वालिटी के जीवन दर्शन" की सोच का पर्याय है...
यह बात केवल आदिवासी ही समझ सकता है...कोई गैर आदिवासी D.N.A. नहीं....


जय जोहार,जय आदिवासी,जय भील प्रदेश
भँवरलाल परमार,
सी.सी.सी.सदस्य,
भील ऑटोनोमस कौंसिल